Skip to main content

Posts

Showing posts from March, 2019
अपेक्षित परिणाम नहीँ आते जब कि हमारी सोच भी सही है और नियत भी। सोच + समय का जब समागम होता है =समयानकूल परिणाम मिलता है अब वह परिणाम आपके अनुकूल है या नही यह भी आपकी सोच पर निर्भर करता है।जो बात आपके अनुकूल नही है कोई जरूरी नही की वह दूसरे को भी प्रतिकूल होगी। मेरे विचार से हर एक का समय अलग अलग होता है।
हम सभी के पास हर दिन एक ही संख्या में घंटे होते हैं। यदि हम एक दिन में उन चौबीस को खर्च करते हैं जो हमारे पास एक कुशल तरीके से हैं तो हम कार्यों को पूरा करने और दिन के लिए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं। यदि हम व्यर्थ गतिविधियों पर अपना समय बर्बाद करते हैं तो हम या तो उन कार्यों को करने पर जोर देते हैं जो हमें करने की आवश्यकता होती है या जो करने की आवश्यकता होती है वह करने में विफल रहते हैं। यदि हम अपने अल्पकालिक और दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल होना चाहते हैं तो हमें अपने समय को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने की आवश्यकता है। अपने लिए टाइम टेबल बनाना सबसे अच्छा है। टाइम टेबल व्यावहारिक होना चाहिए ताकि हम वास्तव में इसका पालन कर सकें। अन्यथा हम समय-सारणी का पालन करने में असमर्थ होने के कारण मोहभंग और तनाव में आ जाएंगे। हमें अपनी दैनिक दिनचर्या में आराम और विश्राम की गतिविधियों को भी समायोजित करना चाहिए ताकि हम कुशलता से काम करने में सक्षम महसूस करें। हमारे पास एक व्यायाम आहार भी होना चाहिए जो हमें शारीरिक रूप से स्वस्थ और स्वस्थ रख सके। एक अनुशासन और एक श...
मन हमेशा परेशान रहता है यह बहुत ही स्वाभाविक सी बात है। मन की इच्छाएं अनंत है और इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति के लिए मन बेचैन रहता है जिसके कारण मन में परेशानी बनी रहती है। अगर मन को परेशान होने से बचाना है तो अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण पाना होगा। जब इच्छाएं नियंत्रित हो जाएंगी तब मन अपने आप ही शांत हो जाएगा।  pc-google यह केवल सुनने में अच्छा लगता है वास्तविक तौर पर मन को शांत रखना बहुत ही मुश्किल है। मनुष्य की प्रकृति होती है कि निरंतर वह नई चीजों को पाने की लालसा रखता है और उसके पीछे लगातार भागते रहता है, इसी भागमभाग के बीच उलझकर मन में हमेशा परेशानी बनी रहती है। आखिर मन पर नियन्त्रण पाया कैसे जाय यह भी हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हमे मन पर नियंत्रण पाना है या नही ।
दुर्योधन की पत्नी का नाम था भानुमति। भानुमति और दुर्योधन की दो संताने थी -एक बेटा लक्ष्मण और बेटी लक्ष्मणा।  राजकुमारी भानुमति के लिए जब उनके पिता ने स्वयंवर रचाया, तब दुर्योधन के अलावा और भी कई बड़े योद्धा जैसे जरासंध, शिशुपाल आदि भी उसमें शामिल हुए। स्वयंवर का नियम था कि हर प्रतिभागी खड़ा होकर अपना नाम और अपने वंश के बारे में बताएगा।  भानुमति स्वयंवर के लिए सुंदर वस्त्र आभूषण पहन कर अपनी दासी के साथ स्वयंवर में आई। दुर्योधन को पहली नजर में भानुमति भा गई और उसने भानुमति को अपनी पत्नी बनाने का निश्चय कर लिया। भानुमति ने हर प्रतिभागी का नाम और वंश ध्यान से सुना, लेकिन दुर्योधन को नजरअंदाज कर आगे बढ़ गई। दुर्योधन को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई, उसने कर्ण के साथ मिलकर भानुमती का अपहरण कर लिया और आखिरकार भानुमति ने दुर्योधन को अपना पति स्वीकार कर लिया दुर्योधन का यही सोच और हिम्मत उसे भविष्य मे और बुरे कारनामे करने मे मदद देते चले गये। परिणाम आप सब जनते है।

सोच

बिना बिचारे जो करे सो पाछे पछताय, काम बिगारे आपनो जग मे होत हसाये ।। 😑😡
कौन जिम्मेदार है जब घटिया काम का खमियाजा हम खामखाँ भोगते हैं ।यह हमारी सोच ही है जो ऐसे परिणाम लाती है।

सोच

हम जैसा सोचते हैं वैसा ही बनते हैं इसलिए सोचने से पहले यह तय करले कि हमें क्या चाहिये।